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स्‍वतंत्रता के सही मायने - स्वतन्त्रता दिवस विशेष

Posted on Saturday, July 31, 2021

"स्‍वतंत्रता एक ऐसा अवसर है जिसके बिना व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व तथा समाज का विकास संभव नहीं है बशर्ते स्‍वतंत्रता वहीं तक सीमित होनी चाहिए जहां तक किसी अन्‍य व्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता में बाधा न पहुंचे ।"
 
स्‍वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में स्वतन्त्रता का सही अर्थ समझना आवश्यक है। स्‍वतंत्रता को कई तरह से परिभाषित किया गया है। स्‍वतंत्रता के बारे में विभिन्‍न राजनीतिक चिंतकों के अलग-अलग मत हैं । जिसमें से कुछ का मानना है कि कार्य करने में कोई बाधा न होना स्‍वतंत्रता है इस समूह के राजनीतिक चिंतकों के अनुसार व्‍यक्ति को कार्य करने के लिए कोई बाधा नहीं होनी चाहिए, पूर्ण स्‍वंतत्रता होनी चाहिए । कुछ राजनीतिक चिन्तकों द्वारा स्‍वतंत्रता की इस परिभाषा को स्‍वतंत्रता का नकारात्‍मक अर्थ माना गया । 
जबकि कुछ अन्‍य राजनीतिक चिंतकों के मत में व्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता वहीं तक ही सीमित होनी चाहिए, जहां तक अन्‍य व्‍यक्तियों की स्‍वतंत्रता बाधित न हो  इसे स्‍वतंत्रता का सकारात्‍मक अर्थ माना गया ।
चूंकि मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी है । समाज का विकास समाज में रहने वाले व्‍यक्तियों पर निर्भर करता है और व्‍यक्तियों का विकास तभी संभव है जब इसके कार्य करने में कोई बाधा न हो ।
परंतु समाज में भिन्‍न-भिन्‍न सोच व मान्‍यताओं वाले लोग रहते हैं, इसलिए बाधाओं का बि‍ल्‍कुल न होना असंभव जैसा है बाधाएं जाने अनजाने में भी आ सकती है । जाने अनजाने भी गलतियां होती रहती हैं जो किसी को बाधित कर सकती हैं ।
इसलिए स्वतन्त्रता को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि "स्‍वतंत्रता एक ऐसा अवसर है जिसके बिना व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व तथा समाज का विकास संभव नहीं है बशर्ते स्‍वतंत्रता वहीं तक सीमित होनी चाहिए जहां तक किसी अन्‍य व्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता में बाधा न पहुंचे ।"
समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियां, भेदभाव (यथा- जाति, धर्म इत्‍यादि), आर्थिक असमानतायें, शक्तियों का केंन्‍द्रीकरण आदि ऐसे पहलू हैं जिनसे व्‍यक्तियों की स्‍वतंत्रता में सेंध लग सकती है ।
 व्‍यक्तियों की स्‍वतंत्रता को सुनिश्चित करने, सुरक्षित रखने के लिए कुछ व्‍यक्तियों की स्‍वतंत्रता को सामाजिक या कानूनी नियमों से सीमित करना पड़ता है। व्‍यक्तियों की स्‍वतंत्रता की सुरक्षा के लिए स‍ंविधान में अधिकारों तथा कर्तव्‍यों को परिभाषित किया गया है, जिससे स्‍वतंत्रता में राजकीय दखल को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है। कार्यपालिका, व्‍यवस्‍थापिका तथा न्‍यायपालिका के बीच शक्तियों का विभाजन स्‍वतंत्रता सुनिश्चित करने का साधन माना जाता है । न्‍यायपालिका की निष्‍पक्षता को स्‍वतंत्रता का प्रमुख रक्षक माना जाता है ।
समाज तथा समाज में रहने वाले व्‍यक्तियों को चाहिए कि वे अपनी स्‍वतंत्रता की सुरक्षा हेतु जागरुक रहें, सरकार चुनने से पहले ध्‍यान रखें कि सरकार ऐसी  हो जिससे शक्ति, वित्‍त आदि का केंद्रीकरण न हो, समाज में जातिगत भेदभाव, धर्मगत भेदभाव, आर्थिक असमानता आदि को बढ़ावा न मिले, सबको समान अवसर मिले । व्‍यक्तियों को ध्‍यान रखना चाहिए कि उनके वक्‍तव्‍यों और कृत्‍यों से समाज में हीनता, भेदभाव या अन्‍य सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा न मिले और न ही किसी व्‍यक्ति को आर्थिक, मानसिक व सामाजिक क्षति ही पहुंचे ।
व्‍यक्तियों को यह विशेष ध्‍यान रखना चाहिए कि उसके द्वारा किये गये कृत्‍यों अथवा वक्‍तव्‍यों से कोई व्‍यक्ति अथवा व्‍यक्ति समूह अनुचित कृत्‍य करने हेतु प्रेरित न हो, अन्‍यथा स्‍वतंत्रता सीमित होने लगती है । इसलिए व्‍यक्तियों को मधुर एवं स्‍पष्‍ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए । समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना व निभाना चाहिए।
यह समाज हम लोगों से मिलकर बना है, हम सब की स्‍वतंत्रता ही समाज की स्‍वतंत्रता है । समाज का विकास हमसे है और हमारा विकास समाज से है । इसलिए सबकी स्‍वतंत्रता की सुरक्षा सर्वप्रथम हमारी जिम्‍मेदारी है । स्‍वतंत्रता को सुरक्षित एवं सुनिश्चित करने के लिए हमें अपने रहन-सहन, भाषा, वक्‍तव्‍य, कृत्‍य इत्‍यादि को संयमित रखना होगा । लोगों को जागरुक करना होगा । स्‍वतंत्रता को सही मायने में समझना व समझाना होगा ।
  
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